Dosh Nivaran

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पितृ दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण योग माना जाता है, जिसका संबंध पूर्वजों और पारिवारिक कर्मों से जोड़ा जाता है। ज्योतिष के अनुसार, जब कुंडली में सूर्य, राहु, केतु या अन्य ग्रहों की विशेष स्थिति बनती है
अंगारक दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण ग्रह दोष माना जाता है। यह दोष सामान्यतः जन्म कुंडली में मंगल और राहु की युति होने पर बनता है। मंगल ऊर्जा, साहस, क्रोध और पराक्रम का प्रतिनिधित्व करता है,
अंगारक दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण ग्रह दोष माना जाता है। यह दोष सामान्यतः जन्म कुंडली में मंगल और राहु की युति होने पर बनता है। मंगल ऊर्जा, साहस, क्रोध और पराक्रम का प्रतिनिधित्व करता है,
विष दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण ग्रह योग माना जाता है। सामान्यतः जन्म कुंडली में चंद्रमा और शनि की युति या परस्पर प्रभाव होने पर विष दोष बनने की संभावना मानी जाती है। चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक शांति का प्रतिनिधित्व करता है,
केमद्रुम दोष वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा से संबंधित एक महत्वपूर्ण दोष माना जाता है। यह दोष सामान्यतः तब बनने की मान्यता है जब जन्म कुंडली में चंद्रमा से दूसरे और बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो। चंद्रमा मन, भावनाओं, मानसिक शांति और संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है।
मंगल दोष वैदिक ज्योतिष में विवाह से संबंधित प्रमुख दोषों में से एक माना जाता है। इसे मांगलिक दोष भी कहा जाता है। सामान्यतः जन्म कुंडली में मंगल ग्रह के कुछ विशेष भावों, जैसे लग्न, चंद्रमा या शुक्र से संबंधित स्थिति में होने पर मंगल दोष बनने की मान्यता है।
श्रापित दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण ग्रह योग माना जाता है। सामान्यतः जन्म कुंडली में शनि और राहु की युति होने पर श्रापित दोष बनने की मान्यता है। शनि कर्म, अनुशासन, संघर्ष और देरी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि राहु भ्रम, असामान्य परिस्थितियों और अचानक होने वाले परिवर्तन से जुड़ा ग्रह माना जाता है।
बालारिष्ट दोष वैदिक ज्योतिष में शैशव अवस्था और बाल्यकाल से संबंधित एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय योग माना जाता है। ‘बालारिष्ट’ का अर्थ बाल्यावस्था में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों से लिया जाता है। जन्म कुंडली में चंद्रमा की कमजोर स्थिति, लग्न और लग्नेश पर अशुभ प्रभाव तथा कुछ विशेष ग्रह योगों के कारण बालारिष्ट योग बनने की मान्यता है।
साढ़ेसाती वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह के गोचर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है। जब शनि व्यक्ति की जन्म राशि यानी चंद्र राशि से 12वें, प्रथम और द्वितीय भाव में गोचर करता है, तब साढ़ेसाती की अवधि शुरू होती है। यह लगभग साढ़े सात वर्ष तक चलती है और इसे तीन चरणों में विभाजित किया जाता है।
चांडाल दोष वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण ग्रह योग माना जाता है। सामान्यतः जन्म कुंडली में गुरु (बृहस्पति) और राहु की युति होने पर गुरु चांडाल दोष बनने की मान्यता है। कुछ ज्योतिषीय मतों में केतु के साथ गुरु के संबंध को भी विचार किया जाता है।
काल सर्प दोष वैदिक ज्योतिष में चर्चित ग्रह योगों में से एक माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार जब जन्म कुंडली में सभी सात प्रमुख ग्रह—सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि—राहु और केतु की धुरी के एक ही ओर स्थित हों, तब काल सर्प दोष बनने की स्थिति मानी जाती है।