बालारिष्ट दोष वैदिक ज्योतिष में शैशव अवस्था और बाल्यकाल से संबंधित एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय योग माना जाता है। ‘बालारिष्ट’ का अर्थ बाल्यावस्था में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों से लिया जाता है। जन्म कुंडली में चंद्रमा की कमजोर स्थिति, लग्न और लग्नेश पर अशुभ प्रभाव तथा कुछ विशेष ग्रह योगों के कारण बालारिष्ट योग बनने की मान्यता है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार बालारिष्ट दोष होने पर बच्चे के स्वास्थ्य, शारीरिक विकास और शुरुआती जीवन में परेशानियों की संभावना बताई जाती है। बार-बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, कमजोरी, मानसिक बेचैनी या बाल्यकाल में विभिन्न प्रकार की बाधाएं इसके संभावित प्रभावों में मानी जाती हैं। हालांकि, केवल किसी एक ग्रह या योग के आधार पर बालारिष्ट दोष का निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
जन्म कुंडली में मौजूद शुभ ग्रहों की दृष्टि, मजबूत लग्न, चंद्रमा की स्थिति और अन्य शुभ योग बालारिष्ट के प्रभाव को कम या समाप्त कर सकते हैं। इसलिए बच्चे की पूरी कुंडली का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। आधुनिक दृष्टि से बच्चे के स्वास्थ्य संबंधी किसी भी चिंता में योग्य चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता देना चाहिए।
ज्योतिषीय परंपरा में बालारिष्ट दोष की शांति के लिए भगवान शिव की पूजा, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, नवग्रह शांति, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठान जैसे उपाय बताए जाते हैं। माता-पिता द्वारा नियमित पूजा और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना भी शुभ माना जाता है।
बालारिष्ट दोष को लेकर अनावश्यक भय नहीं रखना चाहिए। कुंडली में दोष के साथ-साथ उसके निवारण और शुभ योगों का भी अध्ययन किया जाता है। अनुभवी ज्योतिषी से संपूर्ण जन्म कुंडली का विश्लेषण करवाकर स्थिति को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

